🌸 श्रीमती दीप्ति गुप्ता : जीवन परिचय 🌸
🌸 श्रीमती दीप्ति गुप्ता : जीवन परिचय 🌸
मेरी पत्नी श्रीमती दीप्ति गुप्ता का जन्म 8 अप्रैल 1986 को उत्तर प्रदेश के जनपद संभल के ऐतिहासिक नगर सराय तरीन में श्री संतराम गुप्ता एवं श्रीमती कुमकुम गुप्ता के स्नेहमयी परिवार में हुआ। परिवार में दो बहनें—श्रीमती चारु वार्ष्णेय, श्रीमती स्वाति वार्ष्णेय तथा एक भाई श्री प्रतीक वार्ष्णेय हैं।
बचपन से ही दीप्ति का स्वभाव अत्यंत सरल, शांत, विनम्र एवं संस्कारी था। मधुर मुस्कान, आत्मीय व्यवहार और सभी के प्रति सम्मान की भावना उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी। वे जहाँ भी रहीं, अपने व्यवहार और स्नेह से लोगों के हृदय में विशेष स्थान बना लिया। उन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण कर बी.एड. (Bachelor of Education) की उपाधि प्राप्त की।
2 फरवरी 2012 को मेरा और दीप्ति का विवाह उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ में संपन्न हुआ। यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों के प्रेम, विश्वास और अपनत्व का सुंदर मिलन था। विवाह के पश्चात उन्होंने मेरे परिवार को पूरे मन से अपनाया और प्रत्येक रिश्ते को प्रेम, सम्मान तथा समर्पण के साथ निभाया।
8 नवंबर 2012 को पुत्री मोनिशा तथा 23 नवंबर 2016 को पुत्र मेहुल के जन्म से हमारे परिवार की खुशियाँ कई गुना बढ़ गईं। माँ बनने के बाद उनका सम्पूर्ण जीवन अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, अच्छे संस्कार और सुखी जीवन के लिए समर्पित हो गया। उन्होंने एक आदर्श पत्नी, बहू और माँ के रूप में उन्होंने हर भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाया। सुख-दुःख, सफलता-संघर्ष—हर परिस्थिति में वे अपने परिवार के साथ अटल खड़ी रहीं। बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान, बच्चों का स्नेहपूर्ण पालन-पोषण और परिवार की एकता को बनाए रखना उनके जीवन का मूल उद्देश्य था।
दीप्ति का व्यक्तित्व अत्यंत प्रेरणादायक था। वे स्वभाव से धैर्यवान, सहयोगी, विनम्र और संवेदनशील थीं। परिवार, रिश्तेदार, मित्र अथवा परिचित—जो भी उनके संपर्क में आता, वह उनके आत्मीय व्यवहार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। उनके चेहरे की सहज मुस्कान लोगों के मन में अपनापन भर देती थी।
उन्हें स्वादिष्ट भोजन बनाना अत्यंत प्रिय था। परिवार के प्रत्येक सदस्य की पसंद का विशेष ध्यान रखना उन्हें आत्मिक संतोष देता था। इसके साथ ही उन्हें सिलाई का भी विशेष शौक था। घर की प्रत्येक जिम्मेदारी को वे केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि अपने प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति मानती थीं। उनका विश्वास था कि परिवार की खुशियों से बढ़कर जीवन में कोई उपलब्धि नहीं होती।
उनके व्यक्तित्व की एक विशेष बात यह थी कि सामान्य दिनों में यदि वे किसी को इंजेक्शन लगते हुए या रक्त निकलते हुए देख लेती थीं, तो वे अत्यंत घबरा जाती थीं। कई बार तो वे बेहोश तक हो जाती थीं। उन्हें स्वयं भी कभी यह आभास नहीं रहा होगा कि भविष्य में जीवन उन्हें ऐसी कठिन परीक्षा के सामने खड़ा करेगा, जहाँ उन्हें बार-बार रक्त परीक्षण, अनगिनत इंजेक्शन, कीमोथेरेपी तथा अनेक जटिल चिकित्सीय प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ेग
24 सितंबर 2025 को अचानक उनकी तबीयत अत्यंत खराब हो गई। प्रारम्भिक जाँचों के बाद उन्हें शेखर सराफ मेमोरियल हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ विस्तृत परीक्षणों से यह पुष्टि हुई कि वे B-ALL (B-cell Acute Lymphoblastic Leukemia) अर्थात ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं। यह समाचार पूरे परिवार के लिए वज्रपात के समान था। फिर भी परिवार ने धैर्य बनाए रखा और तत्काल बेहतर उपचार के लिए उन्हें AIIMS, New Delhi ले जाया गया।
25 सितंबर 2025 को उन्हें AIIMS के आपातकालीन विभाग में भर्ती किया गया तथा 26 सितंबर 2025 से IRCH (Institute Rotary Cancer Hospital) में उनका उपचार प्रारम्भ हुआ। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट तक देना पड़ा। यह समय पूरे परिवार के लिए अत्यंत कठिन था। एक ओर विशेषज्ञ चिकित्सकों की अथक मेहनत चल रही थी, तो दूसरी ओर परिवार की निरंतर प्रार्थनाएँ।
धीरे-धीरे उपचार का सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगा। कठिन दिनों, अनगिनत दवाइयों और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के बाद उनकी स्थिति में सुधार होने लगा। अंततः 17 अक्टूबर 2025 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई। यह दिन केवल अस्पताल से घर लौटने का नहीं था, बल्कि पूरे परिवार के लिए आशा, विश्वास और नए जीवन का प्रतीक बन गया।
अस्पताल से लौटने के बाद भी उपचार और सावधानियाँ लगातार जारी रहीं। दीप्ति ने कभी अपने मनोबल को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनके चेहरे की मुस्कान और सकारात्मक सोच पूरे परिवार के लिए प्रेरणा बन गई। परिवार भी हर क्षण उनके पूर्ण स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करता रहा।
हमें जानकारी मिली कि राजस्थान के पवित्र देवमाली गाँव में भगवान देवनारायण जी की कृपा से श्रद्धापूर्वक झाड़ा लगाया जाता है। इसी विश्वास के साथ 27 नवंबर 2025 को देवमाली गाँव पहुँचा, जहाँ मैं और मेरा परिवार झाड़ा लगवाने पहुँचे और भगवान देवनारायण जी की पूजा-अर्चना की। इसके बाद हमें उनकी शारीरिक स्थिति में लगातार सुधार दिखाई देने लगा। अगले लगभग चार महीनों में मैं और मेरा परिवार चार बार पुनः देवमाली गाँव गए। परिवार का दृढ़ विश्वास है कि भगवान देवनारायण जी की असीम कृपा, हमारी अटूट श्रद्धा और डॉक्टरों के समर्पित उपचार के संयुक्त प्रभाव से उन्हें अत्यंत लाभ हुआ और अंततः कैंसर से भी मुक्ति मिली।
स्वास्थ्य में सुधार आने के बाद उन्होंने एक बार फिर अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ उसी समर्पण के साथ संभालनी शुरू कर दीं। बच्चों की देखभाल, घर की व्यवस्था और परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखना उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन गया। कठिन बीमारी से गुजरने के बाद भी उन्होंने कभी स्वयं को परिस्थितियों के सामने कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनके भीतर जीने की इच्छा, परिवार के प्रति प्रेम और भविष्य के प्रति आशा पहले की तरह अडिग बनी रही।
स्वास्थ्य लाभ के बाद जिस जीवन ने फिर से मुस्कुराना शुरू किया था, उसी जीवन के सामने कुछ महीनों बाद एक ऐसी चुनौती आने वाली थी, जो पहले से कहीं अधिक कठिन, अधिक पीड़ादायक और पूरे परिवार की आस्था, धैर्य तथा साहस की अंतिम परीक्षा बनने वाली थी।
जब ऐसा प्रतीत होने लगा था कि जीवन एक बार फिर सामान्य गति से आगे बढ़ने लगा है, तभी नियति ने एक बार फिर कठिन परीक्षा ली। जून 2026 के अंतिम सप्ताह में उनकी तबीयत अचानक पुनः बिगड़ने लगी। प्रारम्भिक लक्षणों के बाद आवश्यक चिकित्सकीय जाँचें कराई गईं, जिनसे यह स्पष्ट हुआ कि B-ALL (B-cell Acute Lymphoblastic Leukemia) दोबारा सक्रिय हो चुका है।
यह समाचार पूरे परिवार के लिए अत्यंत पीड़ादायक था। जिस बीमारी को पीछे छोड़ आने का विश्वास बन चुका था, वही एक बार फिर उनके जीवन के सामने खड़ी थी। फिर भी परिवार ने धैर्य नहीं खोया। सभी ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि इस बार भी वे पूरे साहस, विश्वास और सकारात्मक सोच के साथ इस कठिन संघर्ष का सामना करेंगे।
4 जुलाई 2026 को उन्हें पुनः AIIMS, New Delhi में भर्ती कराया गया। विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में उपचार तत्काल प्रारम्भ हुआ। आवश्यक जाँचें, कीमोथेरेपी, दवाइयाँ, रक्त जाँच, बोन मैरो परीक्षण तथा अन्य सभी चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ निरंतर चलती रहीं। चिकित्सकों की पूरी टीम उन्हें स्वस्थ करने के लिए दिन-रात प्रयासरत थी, जबकि परिवार ईश्वर से उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की निरंतर प्रार्थना करता रहा।
यही वह समय था जब उनके असाधारण साहस ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। जो दीप्ति कभी किसी को इंजेक्शन लगते देखकर घबरा जाती थीं, वही अब स्वयं अनगिनत इंजेक्शन, बार-बार रक्त परीक्षण, कठिन कीमोथेरेपी, बोन मैरो परीक्षण और उपचार से जुड़ी अनेक जटिल प्रक्रियाओं का धैर्यपूर्वक सामना कर रही थीं। उन्होंने कभी अपने दर्द को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। शारीरिक कष्ट कितना भी गहरा रहा हो, उनके चेहरे पर धैर्य, संयम और परिवार के प्रति विश्वास हमेशा बना रहा।
उपचार के दौरान कई ऐसे क्षण आए जब चिकित्सकीय रिपोर्टों में सुधार दिखाई देता था। उन छोटी-छोटी सकारात्मक खबरों से पूरे परिवार के मन में नई आशा का संचार होता था। प्रत्येक सुबह यह विश्वास लेकर आती थी कि आज की रिपोर्ट पहले से बेहतर होगी, और प्रत्येक रात अगले दिन की उम्मीद के साथ समाप्त होती थी। यही आशा परिवार की सबसे बड़ी शक्ति बनी रही।
किन्तु 21 जुलाई 2026 को उपचार के दौरान चिकित्सकों ने बताया कि उन्हें HLH-MAS (Hemophagocytic Lymphohistiocytosis – Macrophage Activation Syndrome) जैसी अत्यंत गंभीर चिकित्सीय जटिलता हो गई है। इस स्थिति ने उपचार को और अधिक कठिन बना दिया। अब केवल कैंसर से ही नहीं, बल्कि उसके साथ उत्पन्न इस जटिल बीमारी से भी एक साथ संघर्ष करना पड़ रहा था। चिकित्सकों की पूरी टीम हर संभव प्रयास में लगी रही और परिवार का विश्वास ईश्वर की कृपा पर पहले से भी अधिक दृढ़ हो गया।
23 जुलाई 2026 को उनकी स्थिति और अधिक गंभीर हो गई। उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। चिकित्सकों ने परिवार को बताया कि अगले 48 से 72 घंटे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह सुनकर पूरे परिवार की चिंता बढ़ गई, किन्तु किसी ने भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। अस्पताल का प्रत्येक क्षण प्रार्थनाओं, विश्वास और प्रतीक्षा से भरा हुआ था।
26 जुलाई 2026 की प्रातः लगभग 4:00 बजे उनकी स्थिति अचानक अत्यंत गंभीर हो गई। चिकित्सकों ने तत्काल उन्हें पूर्ण वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा और उन्हें बचाने के लिए हर संभव चिकित्सकीय प्रयास प्रारम्भ किए। विशेषज्ञ डॉक्टर लगातार उपचार में जुटे रहे। परिवार के सभी सदस्य अस्पताल में ईश्वर से केवल एक ही प्रार्थना कर रहे थे—किसी प्रकार दीप्ति एक बार फिर स्वस्थ होकर अपने परिवार के बीच लौट आएँ।
चिकित्सकों के अथक प्रयासों, आधुनिक चिकित्सा और परिवार की अनगिनत प्रार्थनाओं के बावजूद 26 जुलाई 2026 को प्रातः 6 बजकर 11 मिनट पर उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली।
उस क्षण केवल एक जीवन का अंत नहीं हुआ, बल्कि एक परिवार की धड़कन, एक माँ की ममता, एक पत्नी का साथ, एक बेटी का स्नेह, एक बहू का समर्पण और अनगिनत रिश्तों का आधार मौन हो गया। अस्पताल की उस सुबह ने पूरे परिवार के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।
जब उनका पार्थिव शरीर अंतिम बार घर लाया गया, तब पूरा वातावरण शोक और मौन से भर गया। परिवार, रिश्तेदार, मित्र, पड़ोसी और शुभचिंतक उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हुए। हर चेहरे पर गहरा दुःख और हर आँख में अश्रु थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरे घर की रौनक एक ही क्षण में शांत हो गई हो।
इसी बीच एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसने वहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को भीतर तक झकझोर दिया। उनकी मासूम भतीजी धीरे-धीरे अपनी प्रिय छोटी ताई के पास पहुँची। उसने उन्हें निश्चल अवस्था में लेटा हुआ देखा और भोलेपन से बार-बार कहने लगी—
उस मासूम बच्ची को यह ज्ञात ही नहीं था कि उसकी प्रिय छोटी ताई अब कभी नहीं उठेंगी। उसकी निष्कपट पुकार सुनकर वहाँ उपस्थित शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा होगा जिसकी आँखें नम न हुई हों। उस क्षण समय जैसे ठहर गया था। उस मासूम आवाज़ ने उस दिन के दुःख को और भी गहरा कर दिया।
अस्थि एवं पुष्प एकत्र करते समय बेटे मेहुल ने एक अस्थि उठाकर मासूमियत से अपने ताऊजी से कहा—
थोड़ी देर बाद उसे एक दाँत मिला। वह दौड़कर अपने पापा के पास आया और बोला—
उस मासूम बच्चे को यह कहाँ पता था कि वह अपनी माँ की अंतिम निशानियाँ अपने हाथों में समेट रहा है। उस पल वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम थीं। ऐसा दर्द शब्दों में नहीं, केवल महसूस किया जा सकता है।
श्रीमती दीप्ति गुप्ता का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच की एक यात्रा नहीं था। वह प्रेम, त्याग, धैर्य, साहस, विश्वास और परिवार के प्रति निस्वार्थ समर्पण की ऐसी प्रेरणादायी गाथा है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य का साहस, विश्वास और अपने परिवार के प्रति प्रेम उसे अंत तक संघर्ष करने की शक्ति देता है। उन्होंने जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाया और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी कभी अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया।
आज वे हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनका स्नेह, उनके संस्कार, उनकी मधुर मुस्कान, उनका संघर्ष, उनका त्याग और उनकी प्रेरणादायी स्मृतियाँ सदैव परिवार के प्रत्येक सदस्य के हृदय में जीवित रहेंगी। उनका जीवन हम सभी को यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, सच्चे संस्कार कभी मिटते नहीं, और जो व्यक्ति अपने व्यवहार से लोगों के हृदय में स्थान बना लेता है, वह शरीर से विदा होने के बाद भी सदैव अमर रहता है।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा समस्त परिवार को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति दें।
दीप्ति के उपचार के कठिन समय में जिन-जिन लोगों ने मेरा और मेरे परिवार का साथ दिया, मैं उन सभी के प्रति हृदय से आभारी हूँ।
सबसे पहले मैं समीक्षा जी, मेरी देवरानी, का विशेष धन्यवाद करना चाहता हूँ, जिन्होंने सबसे पहले आगे बढ़कर अपनी प्लेटलेट्स दान कीं और उस कठिन समय में हमारा साथ दिया। उनका यह सहयोग मैं जीवनभर नहीं भूलूँगा।
दिल्ली जैसे शहर में दीप्ति के उपचार के दौरान लगभग 48 यूनिट रक्त और 8 यूनिट प्लेटलेट्स की आवश्यकता पड़ी। रक्त एवं प्लेटलेट्स की व्यवस्था में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों का मैं हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
AIIMS में उपचार के दौरान दीप्ति की मित्रता अल्पना नेगी जी, जो स्वयं AML कैंसर सर्वाइवर थीं, से हुई। उनकी सकारात्मक सोच और कैंसर से संघर्ष की कहानी से दीप्ति को बहुत हिम्मत मिली और उनके भीतर स्वस्थ होने की इच्छा तथा विश्वास और मजबूत हुआ। अल्पना जी से बनी यह मित्रता दीप्ति के लिए उस कठिन समय में उम्मीद और सकारात्मक ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण सहारा बनी। मैं अल्पना जी का भी हृदय से आभारी हूँ।
मैं अपने छोटे भाई के मित्र अमित का विशेष रूप से बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने दिन हो या रात, हर समय तन, मन और धन से मेरा और मेरे परिवार का साथ दिया और आवश्यकता पड़ने पर हमेशा आगे रहे।
इसके साथ ही मैं उन सभी रिश्तेदारों, मित्रों, परिचितों और शुभचिंतकों का भी हृदय से धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मेरी और मेरे परिवार की सहायता की, हमारा हौसला बढ़ाया और दीप्ति के लिए प्रार्थना की।
आप सभी का साथ, स्नेह और सहयोग मैं जीवनभर नहीं भूलूँगा।
हृदय से धन्यवाद।
उनका स्नेह, उनके संस्कार, उनका संघर्ष और उनकी मधुर मुस्कान सदैव स्मृतियों में जीवित रहेंगी।